Friday, 5 July 2019

सपने

सूरज के निकलते ही
आंखों के सपने
परिंदों की तरह उड़ जाते हैं
मैं यथार्थ की धरती पर चलता हूं
वक्त की पीठ पर
दुख-सुख की झोली लादे
दिन भर चलता हूं
और सांज के ढलते ही
जिंदगी के चूल्हे से निकले
धुएं की तरह
शून्य में अंतर्लीन हो जाता हूं।

निर्मला सिंह

तरक़्क़ी

अब तरक्की कर ली है
शन्नो, शबनम और सुखविंदर के
गांव ने

वहां तक
पहले शहर की सड़क का रास्ता जाता था
अब
शमशान पहुंच गया है

निर्मला सिंह

Thursday, 4 July 2019

ये क्या हो गया?

रात-रात भर में झर गए
इंसान सूखे फल, फूल, पत्तों से
आती रहीं गोलियों की आवाजें धाय-धाय
फिर छा गया सन्नाटा
बाद में
आवाजें हवाओं की और सीटियां पुलिस वालों की सुनाई देने लगी कानों को
छत पर जाकर देखा
तो पता चला झगड़ा करवाया धर्मों के ठेकेदारों ने और दावत दी कुत्तों को धरती के
आकाश के चील-कौवे और वाजों को
लेकिन बंद कमरों में
हो रही थी सभाएं
उन्हीं धर्मों के ठेकेदारों की
दावतें, मदिरा और गोश्त की
जल रहे थे घर और दुकानें मासूमों के।

निर्मला सिंह

शब्दावली

वह आया था
चला गया
पलभर में ही दृष्टि मार्ग से
अंतःस्थल में प्रवेश कर गया
तब मैं कुछ ना बोली
अब बोलने को
बहुत कुछ दे गया
उसकी दृष्टि में ही
संपूर्ण ब्रह्मांड था
वह दृष्टि से ही
सम्पूर्ण शब्दावली बांच गया।

निर्मला सिंह

सेंध

अब सेंध का जमाना नहीं है
अब खिड़कियां-दरवाजे उखाड़े जाते हैं
चोरी हो जाती है दिलो-दिमाग की
तुम्हें पता ही नहीं चलता कि
क्या-क्या चोरी हो गया
तुम्हारे अंतर्मन में से
तुम खुद को पहचान नहीं पाते हो

निर्मला सिंह

बोनसाई


















तो तुमने! काट-छांट ही लिया
एक वृक्ष की जड़ों, डालियों को
और बना दिया बोनसाई
जिसके नीचे ना धरती है अपनी
न आकाश अपना
जो शोभा है
ड्राइंग रूम
और बरामदों की

निर्मला सिंह

सफाई

तुम रात को सोने से पहले
झाड़ू बुहारी लगाकर दुष्कर्म और दुर्विचारों का कूड़ा-कचरा, सूखे पत्ते, कागज
कूड़ेदान में डाल कर
बाहर फेंक दिया करो
ताकि अगली सुबह
न आए सड़ान्ध
तुम्हारे दिलो-दिमाग से
निर्मला सिंह

Tuesday, 2 July 2019

सुमन सुगंध

सुमन सुगंध
झोली भर लाऊं
चुपके-चुपके चुपके
दिलो-दिमाग को महकाऊँ
तू मैं प्रकृति
और प्रकृति में
एक हो जाऊं
फिर बन जाऊं
सत्यं शिवम सुंदरम
निर्मला सिंह

दिल करता है

दिल करता है
आंचल भर-भर
धूप सुनहरी लाऊं
मन सदन के कोने-कोने
मैं उसको बिखराऊं
दिल करता है
श्वेत चांदनी
मुट्ठी भर भर लाऊं
अंतरमन के प्रांगण में हर रात फैलाऊँ
तो दिन-रात
सत्यम शिवम सुंदरम
का उजास हो जाए
निर्मला सिंह

दोस्ती एक पुल है

दोस्ती यही तो नहीं
कि जो तुमने कहा
मैंने कर दिया
जो मैंने कहा
वह तुमने कह दिया
यह तो छाया काया की तरह
आत्मा परमात्मा की तरह है
कोई प्रतिदान नहीं
कोई बदला नहीं
कोई स्वार्थ नहीं
यह तो एक पुल है
दो दिलों को जोड़ने वाला

निर्मला सिंह

जन्म

बहुत पीड़ा होती है
कंपकंपाता है, थरथराता है दिल
बहते हैं आंखों से आंसू
छलक आती है माथे पर पसीने की बूंदें
अंतर्मन चीत्कार करता है
प्रसव वेदना की भांति
जब होता है
एक कविता का जन्म
एक कहानी का जन्म
निर्मला सिंह

कब्रिस्तान

तुम्हारी देह में
एक नहीं अनेकों लाशों के ताबूत
कब्रों में दफनाए हुए हैं
मरे हुए सपनों की टूटी-फूटी क्षीण चाहतों की अतृप्त इच्छाओं, कामनाओं की
अपनी बेरोजगारी की
अविवाहित युवा होती बहन की शादी
न कर पाने की
बूढ़े बीमार माता-पिता के
इलाज न करवा पाने की
ऐसे ही हर रोज कोई ना कोई लाश बढ़ जाती है और तुम्हारे शरीर के श्मशान में
एक नया ताबूत कब्र में दफना दिया जाता है
हो सकता है इतनी कब्रें बढ़ जाएं
कि देह छोटी पड़ जाए।
निर्मला सिंह

घोंसला

वह उठा है
सूरज उगा है
सूनी सूनी फैली आंखें देख रही हैं
सपनों के उड़ते पक्षियों को
जो नापेंगे सारा दिन लंबाई-चौड़ाई
ऊंचे-नीले आसमान के यथार्थ के
हाथ फड़फड़ाते हैं कुछ खाने को
कुछ कहने को
हाथ बेचैन है कुछ करने को
कल की दौड़ धूप से थके
छाले पड़े पांव
आज फ़िर चलने को तैयार हैं
क्योंकि डिग्रियां बंद अलमारी में
अर्द्ध जीवित देहों सी पड़ी कराह रही हैं।।
निर्मला सिंह

Monday, 1 July 2019

दीवार

एक थी दीवार रिश्तो की
जो थी पहले सोंधी मिट्टी से लिपी-पुती होती सुगंधित
अब ऊंची हो गई है
पेंट भी हो गया 

यह दीवार सीमेंट की दिन-ब-दिन
ऊंची होती जा रही है।
टंग रही हैं  वीभत्स हादसों की तस्वीरें
इसका कद ऊंचा
इंसानों का बोना हो गया है।

निर्मला सिंह

दोस्ती

चल रहे हैं साथ-साथ
अथ युग से अद्य युग तक
और चलते रहेंगे
जीवन पर्यंत
चली तेज आंधी
आया तूफान
गिर पड़ा एक
हो गया लंगड़ा
दोनों ने दिया सहारा।
फिर तेज़ आंधी से दूसरे की आंख में धूल गिर गई अंधा हो गया वह।
तीसरे ने सहारा दिया दोनों को
थोड़ा आगे बढ़े
फिर एक बम फटा धाँय-धाँय
तीसरा बहरा हो गया।
फिर भी तीनों साथ-साथ रहे
सत्य, अहिंसा, प्यार।।

निर्मला सिंह

मैं एक औरत हूं

जो आदमी
मुझे निचोड़ना चाहते हो
गीले कपड़ों की तरह
और धूप में पड़ी रस्सी पर
फैलाना चाहते हो।
तुम मुझे सड़क पर पड़ी मिट्टी की तरह
उछालना चाहते हो।
लेकिन मैं गीली हूं
गीली ही रहूंगी

बदमिजाज हवाओं का
नहीं होगा मुझ पर असर
एक शिला हूं
एक चट्टान हूं
जो है हवा, धूप, शीत, बरखा से
बेअसर
मजबूत।

सन्देश

तुम!
एक चांद, सूरज या मशाल न बन सके
तो कच्ची माटी का
दीया ही बन जाओ
मोहब्बत का, प्यार का
और भगा दो
नफरत का अंधेरा।
तुम न बन सके फूलों की कतार या गुलशन
तो केवल
बन जाओ फूल एक
अमनो अमान का,
सुख-शांति का
तुम ना बन सके
सागर या नदी
तो बन जाओ
एक बूंद विश्वास की
तुम न बन सके
सड़क, गली, दोराहा, चौराहा
तो बन जाओ पगडंडी
इंसानियत की।

वनवास

राजा दशरथ ने
प्यार,त्याग, विश्वास के देवता को/ राम को
चौदह वर्षों के लिए बनवास दिया था
अब तो समाज ने
बंजारों की भांति हमेशा के लिए
तीनों को निर्वासित कर दिया है
पता नहीं कब लौट करआएंगे
कब मनाई जाएगी दीवाली।

बीता साल

बीता साल नहीं बैठा
सच्चे ईमानदार इंसान के साथ
कुर्सी खाली पड़ी रही
नहीं बना प्यार मोहब्बत या का मित्र
दोस्त थे उसके हिंसा, भ्रष्टाचार
नहीं पकड़ा उसने
भोले-भाले भाले मासूम विश्वास का हाथ
नहीं खिला बसंत के फूल सा
नहीं चहका सुबह सवेरे पेड़ पर बैठे पाखी सा नहीं बरसा मरुस्थल पर बड़ी बूंदों-सा
नहीं लहराया कल-कल करती पहाड़ी नदी-सा।

निर्मला सिंह

चादर

एक चादर बुनी थी
शहीदों ने
आज़ादी से पहले
उत्तर से दक्षिण
पूर्व से पश्चिम तक
बिछाया था उसे

काढ़े थे उस पर मानवता के बेल बूटे
रंगा था उसको देश भक्ति के रंग में
लेकिन आप राजनीति और समाज के
बदनीयत मौसम से
तेज हवाओं से तार-तार होने लगी है
तो बचाने के लिए
जरूरत है
देश भक्त नौजवानों के हाथों की
जो चादर को रफू कर सकें

खंडहर

खंडहर हो चुका है
तुम्हारे दिल का मकान
छतें दीवारें रोशनदान टूट रहे हैं
नूनी झड़ रही है
और तुम बात करते हो
गुलाब बेला हरसिंगार के फूलों की
जो तुमने आंगन में बोए थे
किसी समय
अंदर की अखंडता से
बाहर भी खंडहर हो चुका है

Sunday, 30 June 2019

कागज़

वक्त के कागज पर
लिखे गए शब्द, अंक
होते हैं कर्मों के, विचारों के
नहीं मिटा सकता कोई भी उनको

कुछ अंक, शब्द शबनम से कोमल
कुछ फूलों से सुंदर सुगंधित
कुछ कांटों से चुभने वाले
कुछ पत्थर से कठोर होते हैं
तो यह मेरे भाई! तुम पर निर्भर करता है
तुम कैसे लिखते हो?
लेकिन इन शब्दों, अंको को
कोई भी रबड़ मिटा नहीं सकती।

निर्मला सिंह

पंछी

हर रोज रात को विश्राम
करने के लिए
ढेरों पंछी आकर बैठ जाते हैं
कभी डाली पर, कभी फुंगी पर
अरमानों के, उम्मीदों के, आशाओं के
लेकिन सुबह होते ही उड़ जाते हैं
पता नहीं आज यह क्यों
रात में भी उड़ रहे हैं बेचैन है
ताक रहे हैं कभी नील गगन , कभी डाली,
कभी फुंगी, कभी धरा तो कभी आकाश की ओर और पेड़ आकाश को
आकाश पेड़ की ओर ताक रहा है।

गुलाब

गुलाब खिलता है
महकता है , सुरक्षित है
अपने चारों ओर कांटों की वज़ह से
उसे दिन-रात एक अभूजा, अनजाना भय
नहीं सताता है। वह नहीं डरता है तेज हवाओं से धूप से, पानी से, रेत से,
क्योंकि कांटे हैं उसके रक्षक
उसके मीत
जो जग के हैं शत्रु

बसन्त

मेरे दोस्त
कब आएगा ऐसा बसंत
जब घर-घर, आंगन -आंगन, शहर-शहर, गांव-गांव
खिड़की दरवाजे, रोशनदान
खुले होंगे अंतर्मनों के
प्यार मोहब्बत की खुशबू
विकर्षित होगी गोेशे-गोशे।
सपनों की स्वर्णिम किरणें
अरमानों की शीतल चांदनी
प्रवेश करेगी
बिखरेगी बेझिझक।
कब आएगा ऐसा बसंत
जब मिलो फैक्ट्रियों की चिमनियों से
उठते हुए धुएं से
बू नहीं आएगी मजदूरों के जलते दिलों की।
जब बालक बूढ़े, नौजवानों के
चेहरों पर पैबस्त उदासी, पीड़ा
क्षितिज के पार विलुप्त हो जाएगी
बादलों की तरह
और इंसानियत की चटकती धूप
त्याग विश्वास की शीतल चांदनी
बिखे़ेरेगी अन्तस्थों में

Saturday, 29 June 2019

वक़्त





बन जाता है वक्त सूखी
भुरभुरी सड़क की धूल
जब जब मैं चलती हूं
जिंदगी की सड़क पर
धूल और गुबार ही गुबार आ जाता है
जम जाती है धूल सुखों के वृक्षों पर
उम्मीदों की फुंगियों पर
स्वप्नों की डालियों पर
इंतजार है बारिश का
के जोर से आए।
दुखों की धूल बह जाए
या तेज हवा का झोंका आए
धूल उड़ जाए।

निर्मला सिंह


pic courtesy by

खाड़ी





















तुम ना बन सके
एक महासागर
तो बन जाते एक सागर
यदि बन न सके एक सागर
तो बन जाते खाड़ी
जो जोड़ती है महासागर को
अंतर्मन से
इंसानियत की भूमि से

कैलेंडर

















पुरुष ने मुझे हमेशा
एक कैलेंडर ही बनाना चाहा है
लेकिन मैं बनना चाहती हूं
एक खूंटी
कैलेंडर नहीं
जिसे हर नए साल बदला जाता है
पुराना रद्दी में फेंक दिया जाता है
तुम अपना दुख, दर्द, व्यथा, पीड़ा
और हर्ष भी एक कपड़े की भांति
मुझ पर टांग सकते हो

मेरा शहर

एक जमाना था
जब मेरा शहर
आराम से जीता था,
चैन की नींद सोता था
अब चमक-दमक तो खूब है
लेकिन ना चैन है ना नींद है
मासूमियत खो गई है
हरकतें करता रहता है
और शैतानियां
यह सब आतंकवाद के कारण है
यह मेरा शहर आधुनिक तो हो गया है
लेकिन चांदनी मटमैली है
और धूप धूमिल
सड़कें चोरी चिकनी हो गई हैं
लेकिन सूनी
दूर-दूर तक वृक्षों की छांव नहीं।
भागम भाग है गाड़ियों की
शांति होती है अब आए दिन
होने वाले कर्फ्यू से
उसमें एक ही आवाज सुनाई देती है
सिपाहियों के जूतों की ठक ठक
पुलिस की गाड़ियों के सायरन
समझ नहीं आता
इसकी चमक को
असली कैसे करूं?

निर्मला सिंह

डायरियां
















मैं पढ़ रही हूं
जिंदगी की डायरियां
जिन पर लिखा हो
किसी पन्ने पर प्यार, त्याग, विश्वास
लेकिन एक नहीं
मैं हजार हां डायरियां पढूगी
जीवन के अंत तक
और जीती रहूंगी
उम्मीदों के फूलों की खुशबू लेकर

चूहे

एक नहीं हज़ारों
हैवानियत के चूहों ने
कुतुर डाली है चादरें
प्यार, मुहब्बत, त्याग,
विश्वास की
इन चूहों के बिल भी नहीं दिखाई देते
जिसमें दवाई डाल कर मार दो
दिन ब दिन
बढ़ते ही जा रहे हैं
ये चूहे
यह मोटे हैं।
चूहेदानी में भी
नहीं आते।

निर्मला सिंह

माचिस की तीली

एक माचिस की तीली हो तुम
एक माचिस की तीली हूं मैं
फ़र्क़ है इतना
कि मैंने जलाए हैं दीये
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों, चर्चों में
और तुमने लगाई है आग
शहर-शहर, गांव-गांव
घरों और दुकानों में
काश! हम दोनों ने एक साथ
जन्म न लिया होता
तब जन्मदात्री मां आज दुखी,
पीड़ित न होती
लेकिन दोष न तुम्हारा है,
न मां का
दोष तो उन हाथों का है
जिन्होंने तुम्हें इस्तेमाल किया।

निर्मला सिंह

औरत

उसमें एक नहीं
चारों दिशायें हैं
जब उठती है तब पूरब
जब सोती है तब पश्चिम
दिन भर खटती रहती है
सुबह से शाम तक
उत्तर से दक्षिण
पूरब-पश्चिम
सृष्टि के इस छोर से
उस छोर तक
वह कोई और नहीं
एक औरत है
मां, बहिन, पत्नी, बेटी।

निर्मला सिंह

दीये

मैं मिट्टी का दीया हूँ
मुझमें बाती,
तेल डाल कर जलाया जाता है
दूसरा दीया मुझसे जोड़ो,
बाती उसे भी जला देगी
तीसरा दीया जोड़ो,
बाती उसे भी जला देगी
फिर बन जायेगी दीयों की क़तार
फैल जाएगा उजाला
तो मेरे भाई! तुम भी दीया बनो
प्यार, त्याग, विश्वास की मिट्टी का
भाग जाएगा अंधेरा
हिंसा, द्वेष, नफरत का
दूर बहुत दूर।

फ़र्क़


















मुझमें और तुममें
फ़र्क़ इतना है कि तुम फूल बनना चाहते हो
और मैं तुख्म,
कि तुम चांद, तारा, सूरज बनना चाहते हो
और मैं गगन,
कि तुम गुम्बद, महल की मीनार बनना चाहते हो
और मैं नींव,
कि तुम कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी, उपन्यास बनना चाहते हो
औऱ मैं अक्षर
कि तुम नदी, सागर बनना चाहते हो
और मैं एक बूंद छोटी-सी।

Friday, 28 June 2019

भगवान में तुम हो और तुम में भगवान






















भगवान  में तुम हो और तुम में भगवान


शून्य में ब्रह्माण्ड है
ब्रह्माण्ड में में शून्य
जैसे सागर में बूँद है
और बूँद में सागर
जैसे भगवान  में तुम हो
और तुम में भगवान
क्योंकि तुम्हारे निमित तत्व ही हैं
भ से भूमि
ग से गगन
व से वायु और वहीनं
न से नीर

निर्मला सिंह 

मुलाक़ात खुद से























मुलाक़ात



पहिले मुलाक़ात की तुमसे
फिर इससे। फिर उससे
बहुत खोजा। खोज रही हूँ
लेकिन मिल नहीं पायी हूँ
खुद से
खोज जारी है
वो जो एक पर्दा है।
झीना सा
माया का
मोह का
ममता का
हट नहीं पा रहा है।
लेकिन संकल्प है
एक विश्वास है
कि कभी - न - कभी
होगी मुलाक़ात
खुद से.

निर्मला सिंह

pic courtesy by www.art.com

Wednesday, 26 June 2019

एक -एक लम्हा




एक -एक लम्हा 
एक - एक पल
की कतरनें 
जुड़कर 
सिलती जा रही हैं 
ज़िंदगी की चादर 
कतरनें बचपन की 
जवानी की 
बुढ़ापे की 
चाहत है 
कतरनें  रंगीन, चमकीली,
छींट वाली हों।  

निर्मला सिंह

वह औरत













वह औरत
कभी बन जाती है ! कर्क रेखा
तो कभी मकर रेखा
नहीं बन पायी ! अब तक भूमध्य रेखा
जहां उगते हैं सदाबहार वन खुशियों के
और पड़ती है वृक्षों की फुंगियों पर
सुख की चमचमाती धूप

निर्मला सिंह