Tuesday, 2 July 2019

घोंसला

वह उठा है
सूरज उगा है
सूनी सूनी फैली आंखें देख रही हैं
सपनों के उड़ते पक्षियों को
जो नापेंगे सारा दिन लंबाई-चौड़ाई
ऊंचे-नीले आसमान के यथार्थ के
हाथ फड़फड़ाते हैं कुछ खाने को
कुछ कहने को
हाथ बेचैन है कुछ करने को
कल की दौड़ धूप से थके
छाले पड़े पांव
आज फ़िर चलने को तैयार हैं
क्योंकि डिग्रियां बंद अलमारी में
अर्द्ध जीवित देहों सी पड़ी कराह रही हैं।।
निर्मला सिंह

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