Sunday, 30 June 2019

कागज़

वक्त के कागज पर
लिखे गए शब्द, अंक
होते हैं कर्मों के, विचारों के
नहीं मिटा सकता कोई भी उनको

कुछ अंक, शब्द शबनम से कोमल
कुछ फूलों से सुंदर सुगंधित
कुछ कांटों से चुभने वाले
कुछ पत्थर से कठोर होते हैं
तो यह मेरे भाई! तुम पर निर्भर करता है
तुम कैसे लिखते हो?
लेकिन इन शब्दों, अंको को
कोई भी रबड़ मिटा नहीं सकती।

निर्मला सिंह

पंछी

हर रोज रात को विश्राम
करने के लिए
ढेरों पंछी आकर बैठ जाते हैं
कभी डाली पर, कभी फुंगी पर
अरमानों के, उम्मीदों के, आशाओं के
लेकिन सुबह होते ही उड़ जाते हैं
पता नहीं आज यह क्यों
रात में भी उड़ रहे हैं बेचैन है
ताक रहे हैं कभी नील गगन , कभी डाली,
कभी फुंगी, कभी धरा तो कभी आकाश की ओर और पेड़ आकाश को
आकाश पेड़ की ओर ताक रहा है।

गुलाब

गुलाब खिलता है
महकता है , सुरक्षित है
अपने चारों ओर कांटों की वज़ह से
उसे दिन-रात एक अभूजा, अनजाना भय
नहीं सताता है। वह नहीं डरता है तेज हवाओं से धूप से, पानी से, रेत से,
क्योंकि कांटे हैं उसके रक्षक
उसके मीत
जो जग के हैं शत्रु

बसन्त

मेरे दोस्त
कब आएगा ऐसा बसंत
जब घर-घर, आंगन -आंगन, शहर-शहर, गांव-गांव
खिड़की दरवाजे, रोशनदान
खुले होंगे अंतर्मनों के
प्यार मोहब्बत की खुशबू
विकर्षित होगी गोेशे-गोशे।
सपनों की स्वर्णिम किरणें
अरमानों की शीतल चांदनी
प्रवेश करेगी
बिखरेगी बेझिझक।
कब आएगा ऐसा बसंत
जब मिलो फैक्ट्रियों की चिमनियों से
उठते हुए धुएं से
बू नहीं आएगी मजदूरों के जलते दिलों की।
जब बालक बूढ़े, नौजवानों के
चेहरों पर पैबस्त उदासी, पीड़ा
क्षितिज के पार विलुप्त हो जाएगी
बादलों की तरह
और इंसानियत की चटकती धूप
त्याग विश्वास की शीतल चांदनी
बिखे़ेरेगी अन्तस्थों में

Saturday, 29 June 2019

वक़्त





बन जाता है वक्त सूखी
भुरभुरी सड़क की धूल
जब जब मैं चलती हूं
जिंदगी की सड़क पर
धूल और गुबार ही गुबार आ जाता है
जम जाती है धूल सुखों के वृक्षों पर
उम्मीदों की फुंगियों पर
स्वप्नों की डालियों पर
इंतजार है बारिश का
के जोर से आए।
दुखों की धूल बह जाए
या तेज हवा का झोंका आए
धूल उड़ जाए।

निर्मला सिंह


pic courtesy by

खाड़ी





















तुम ना बन सके
एक महासागर
तो बन जाते एक सागर
यदि बन न सके एक सागर
तो बन जाते खाड़ी
जो जोड़ती है महासागर को
अंतर्मन से
इंसानियत की भूमि से

कैलेंडर

















पुरुष ने मुझे हमेशा
एक कैलेंडर ही बनाना चाहा है
लेकिन मैं बनना चाहती हूं
एक खूंटी
कैलेंडर नहीं
जिसे हर नए साल बदला जाता है
पुराना रद्दी में फेंक दिया जाता है
तुम अपना दुख, दर्द, व्यथा, पीड़ा
और हर्ष भी एक कपड़े की भांति
मुझ पर टांग सकते हो

मेरा शहर

एक जमाना था
जब मेरा शहर
आराम से जीता था,
चैन की नींद सोता था
अब चमक-दमक तो खूब है
लेकिन ना चैन है ना नींद है
मासूमियत खो गई है
हरकतें करता रहता है
और शैतानियां
यह सब आतंकवाद के कारण है
यह मेरा शहर आधुनिक तो हो गया है
लेकिन चांदनी मटमैली है
और धूप धूमिल
सड़कें चोरी चिकनी हो गई हैं
लेकिन सूनी
दूर-दूर तक वृक्षों की छांव नहीं।
भागम भाग है गाड़ियों की
शांति होती है अब आए दिन
होने वाले कर्फ्यू से
उसमें एक ही आवाज सुनाई देती है
सिपाहियों के जूतों की ठक ठक
पुलिस की गाड़ियों के सायरन
समझ नहीं आता
इसकी चमक को
असली कैसे करूं?

निर्मला सिंह

डायरियां
















मैं पढ़ रही हूं
जिंदगी की डायरियां
जिन पर लिखा हो
किसी पन्ने पर प्यार, त्याग, विश्वास
लेकिन एक नहीं
मैं हजार हां डायरियां पढूगी
जीवन के अंत तक
और जीती रहूंगी
उम्मीदों के फूलों की खुशबू लेकर

चूहे

एक नहीं हज़ारों
हैवानियत के चूहों ने
कुतुर डाली है चादरें
प्यार, मुहब्बत, त्याग,
विश्वास की
इन चूहों के बिल भी नहीं दिखाई देते
जिसमें दवाई डाल कर मार दो
दिन ब दिन
बढ़ते ही जा रहे हैं
ये चूहे
यह मोटे हैं।
चूहेदानी में भी
नहीं आते।

निर्मला सिंह

माचिस की तीली

एक माचिस की तीली हो तुम
एक माचिस की तीली हूं मैं
फ़र्क़ है इतना
कि मैंने जलाए हैं दीये
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों, चर्चों में
और तुमने लगाई है आग
शहर-शहर, गांव-गांव
घरों और दुकानों में
काश! हम दोनों ने एक साथ
जन्म न लिया होता
तब जन्मदात्री मां आज दुखी,
पीड़ित न होती
लेकिन दोष न तुम्हारा है,
न मां का
दोष तो उन हाथों का है
जिन्होंने तुम्हें इस्तेमाल किया।

निर्मला सिंह

औरत

उसमें एक नहीं
चारों दिशायें हैं
जब उठती है तब पूरब
जब सोती है तब पश्चिम
दिन भर खटती रहती है
सुबह से शाम तक
उत्तर से दक्षिण
पूरब-पश्चिम
सृष्टि के इस छोर से
उस छोर तक
वह कोई और नहीं
एक औरत है
मां, बहिन, पत्नी, बेटी।

निर्मला सिंह

दीये

मैं मिट्टी का दीया हूँ
मुझमें बाती,
तेल डाल कर जलाया जाता है
दूसरा दीया मुझसे जोड़ो,
बाती उसे भी जला देगी
तीसरा दीया जोड़ो,
बाती उसे भी जला देगी
फिर बन जायेगी दीयों की क़तार
फैल जाएगा उजाला
तो मेरे भाई! तुम भी दीया बनो
प्यार, त्याग, विश्वास की मिट्टी का
भाग जाएगा अंधेरा
हिंसा, द्वेष, नफरत का
दूर बहुत दूर।

फ़र्क़


















मुझमें और तुममें
फ़र्क़ इतना है कि तुम फूल बनना चाहते हो
और मैं तुख्म,
कि तुम चांद, तारा, सूरज बनना चाहते हो
और मैं गगन,
कि तुम गुम्बद, महल की मीनार बनना चाहते हो
और मैं नींव,
कि तुम कविता, गीत, ग़ज़ल, कहानी, उपन्यास बनना चाहते हो
औऱ मैं अक्षर
कि तुम नदी, सागर बनना चाहते हो
और मैं एक बूंद छोटी-सी।

Friday, 28 June 2019

भगवान में तुम हो और तुम में भगवान






















भगवान  में तुम हो और तुम में भगवान


शून्य में ब्रह्माण्ड है
ब्रह्माण्ड में में शून्य
जैसे सागर में बूँद है
और बूँद में सागर
जैसे भगवान  में तुम हो
और तुम में भगवान
क्योंकि तुम्हारे निमित तत्व ही हैं
भ से भूमि
ग से गगन
व से वायु और वहीनं
न से नीर

निर्मला सिंह 

मुलाक़ात खुद से























मुलाक़ात



पहिले मुलाक़ात की तुमसे
फिर इससे। फिर उससे
बहुत खोजा। खोज रही हूँ
लेकिन मिल नहीं पायी हूँ
खुद से
खोज जारी है
वो जो एक पर्दा है।
झीना सा
माया का
मोह का
ममता का
हट नहीं पा रहा है।
लेकिन संकल्प है
एक विश्वास है
कि कभी - न - कभी
होगी मुलाक़ात
खुद से.

निर्मला सिंह

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Wednesday, 26 June 2019

एक -एक लम्हा




एक -एक लम्हा 
एक - एक पल
की कतरनें 
जुड़कर 
सिलती जा रही हैं 
ज़िंदगी की चादर 
कतरनें बचपन की 
जवानी की 
बुढ़ापे की 
चाहत है 
कतरनें  रंगीन, चमकीली,
छींट वाली हों।  

निर्मला सिंह

वह औरत













वह औरत
कभी बन जाती है ! कर्क रेखा
तो कभी मकर रेखा
नहीं बन पायी ! अब तक भूमध्य रेखा
जहां उगते हैं सदाबहार वन खुशियों के
और पड़ती है वृक्षों की फुंगियों पर
सुख की चमचमाती धूप

निर्मला सिंह