बीता साल नहीं बैठा
सच्चे ईमानदार इंसान के साथ
कुर्सी खाली पड़ी रही
नहीं बना प्यार मोहब्बत या का मित्र
दोस्त थे उसके हिंसा, भ्रष्टाचार
नहीं पकड़ा उसने
भोले-भाले भाले मासूम विश्वास का हाथ
नहीं खिला बसंत के फूल सा
नहीं चहका सुबह सवेरे पेड़ पर बैठे पाखी सा नहीं बरसा मरुस्थल पर बड़ी बूंदों-सा
नहीं लहराया कल-कल करती पहाड़ी नदी-सा।
निर्मला सिंह
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