Sunday, 30 June 2019

बसन्त

मेरे दोस्त
कब आएगा ऐसा बसंत
जब घर-घर, आंगन -आंगन, शहर-शहर, गांव-गांव
खिड़की दरवाजे, रोशनदान
खुले होंगे अंतर्मनों के
प्यार मोहब्बत की खुशबू
विकर्षित होगी गोेशे-गोशे।
सपनों की स्वर्णिम किरणें
अरमानों की शीतल चांदनी
प्रवेश करेगी
बिखरेगी बेझिझक।
कब आएगा ऐसा बसंत
जब मिलो फैक्ट्रियों की चिमनियों से
उठते हुए धुएं से
बू नहीं आएगी मजदूरों के जलते दिलों की।
जब बालक बूढ़े, नौजवानों के
चेहरों पर पैबस्त उदासी, पीड़ा
क्षितिज के पार विलुप्त हो जाएगी
बादलों की तरह
और इंसानियत की चटकती धूप
त्याग विश्वास की शीतल चांदनी
बिखे़ेरेगी अन्तस्थों में

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