हर रोज रात को विश्राम
करने के लिए
ढेरों पंछी आकर बैठ जाते हैं
कभी डाली पर, कभी फुंगी पर
अरमानों के, उम्मीदों के, आशाओं के
लेकिन सुबह होते ही उड़ जाते हैं
पता नहीं आज यह क्यों
रात में भी उड़ रहे हैं बेचैन है
ताक रहे हैं कभी नील गगन , कभी डाली,
कभी फुंगी, कभी धरा तो कभी आकाश की ओर और पेड़ आकाश को
आकाश पेड़ की ओर ताक रहा है।
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