एक जमाना था
जब मेरा शहर
आराम से जीता था,
चैन की नींद सोता था
अब चमक-दमक तो खूब है
लेकिन ना चैन है ना नींद है
मासूमियत खो गई है
हरकतें करता रहता है
और शैतानियां
यह सब आतंकवाद के कारण है
यह मेरा शहर आधुनिक तो हो गया है
लेकिन चांदनी मटमैली है
और धूप धूमिल
सड़कें चोरी चिकनी हो गई हैं
लेकिन सूनी
दूर-दूर तक वृक्षों की छांव नहीं।
भागम भाग है गाड़ियों की
शांति होती है अब आए दिन
होने वाले कर्फ्यू से
उसमें एक ही आवाज सुनाई देती है
सिपाहियों के जूतों की ठक ठक
पुलिस की गाड़ियों के सायरन
समझ नहीं आता
इसकी चमक को
असली कैसे करूं?
निर्मला सिंह
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