अब सेंध का जमाना नहीं है
अब खिड़कियां-दरवाजे उखाड़े जाते हैं
चोरी हो जाती है दिलो-दिमाग की
अब खिड़कियां-दरवाजे उखाड़े जाते हैं
चोरी हो जाती है दिलो-दिमाग की
तुम्हें पता ही नहीं चलता कि
क्या-क्या चोरी हो गया
तुम्हारे अंतर्मन में से
तुम खुद को पहचान नहीं पाते हो
क्या-क्या चोरी हो गया
तुम्हारे अंतर्मन में से
तुम खुद को पहचान नहीं पाते हो
निर्मला सिंह
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