Saturday, 30 January 2021

भीड़

मुझे नहीं भाती सिर कटी धड़क अट लास्ट शो अर्थ जीवित

Friday, 5 July 2019

सपने

सूरज के निकलते ही
आंखों के सपने
परिंदों की तरह उड़ जाते हैं
मैं यथार्थ की धरती पर चलता हूं
वक्त की पीठ पर
दुख-सुख की झोली लादे
दिन भर चलता हूं
और सांज के ढलते ही
जिंदगी के चूल्हे से निकले
धुएं की तरह
शून्य में अंतर्लीन हो जाता हूं।

निर्मला सिंह

तरक़्क़ी

अब तरक्की कर ली है
शन्नो, शबनम और सुखविंदर के
गांव ने

वहां तक
पहले शहर की सड़क का रास्ता जाता था
अब
शमशान पहुंच गया है

निर्मला सिंह

Thursday, 4 July 2019

ये क्या हो गया?

रात-रात भर में झर गए
इंसान सूखे फल, फूल, पत्तों से
आती रहीं गोलियों की आवाजें धाय-धाय
फिर छा गया सन्नाटा
बाद में
आवाजें हवाओं की और सीटियां पुलिस वालों की सुनाई देने लगी कानों को
छत पर जाकर देखा
तो पता चला झगड़ा करवाया धर्मों के ठेकेदारों ने और दावत दी कुत्तों को धरती के
आकाश के चील-कौवे और वाजों को
लेकिन बंद कमरों में
हो रही थी सभाएं
उन्हीं धर्मों के ठेकेदारों की
दावतें, मदिरा और गोश्त की
जल रहे थे घर और दुकानें मासूमों के।

निर्मला सिंह

शब्दावली

वह आया था
चला गया
पलभर में ही दृष्टि मार्ग से
अंतःस्थल में प्रवेश कर गया
तब मैं कुछ ना बोली
अब बोलने को
बहुत कुछ दे गया
उसकी दृष्टि में ही
संपूर्ण ब्रह्मांड था
वह दृष्टि से ही
सम्पूर्ण शब्दावली बांच गया।

निर्मला सिंह

सेंध

अब सेंध का जमाना नहीं है
अब खिड़कियां-दरवाजे उखाड़े जाते हैं
चोरी हो जाती है दिलो-दिमाग की
तुम्हें पता ही नहीं चलता कि
क्या-क्या चोरी हो गया
तुम्हारे अंतर्मन में से
तुम खुद को पहचान नहीं पाते हो

निर्मला सिंह

बोनसाई


















तो तुमने! काट-छांट ही लिया
एक वृक्ष की जड़ों, डालियों को
और बना दिया बोनसाई
जिसके नीचे ना धरती है अपनी
न आकाश अपना
जो शोभा है
ड्राइंग रूम
और बरामदों की

निर्मला सिंह