सूरज के निकलते ही
आंखों के सपने
परिंदों की तरह उड़ जाते हैं
मैं यथार्थ की धरती पर चलता हूं
वक्त की पीठ पर
दुख-सुख की झोली लादे
दिन भर चलता हूं
और सांज के ढलते ही
जिंदगी के चूल्हे से निकले
धुएं की तरह
शून्य में अंतर्लीन हो जाता हूं।
निर्मला सिंह
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