निर्मला सिंह का रचना संसार
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Saturday, 29 June 2019
कैलेंडर
पुरुष ने मुझे हमेशा
एक कैलेंडर ही बनाना चाहा है
लेकिन मैं बनना चाहती हूं
एक खूंटी
कैलेंडर नहीं
जिसे हर नए साल बदला जाता है
पुराना रद्दी में फेंक दिया जाता है
तुम अपना दुख, दर्द, व्यथा, पीड़ा
और हर्ष भी एक कपड़े की भांति
मुझ पर टांग सकते हो
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